Saturday, November 19, 2011

दस रूपए!!

वैसे तो कानपुर से लखनऊ की दूरी मात्र ८० किलोमीटर ही है.... लेकिन ये २ घंटे की रेल यात्रा सदा रोमांचकारी रही है.... दीक्षांत समारोह समाप्त हो चुका था... और मैं फिर भी कॉलेज छोड़के नहीं जाना चाहता था... चार साल जिस पल का इंतज़ार सबको रहता है.... चार साल बाद वही पल भारी प्रतीत होता है... २९ मई, २०११ .. सभी दोस्त एक-दूसरे को विदाई दे रहे थे और भविष्य में मिलते रहने की नसीहत .... भारी मन से मैंने भी दोस्तों को अलविदा कहा.. और फिर ऑटो में बैठ गया और रेलवे स्टेशन को चल दिया....

वैसे कानपुर-लखनऊ जैसे शहरों में रेलवे टिकेट खरीदना भी एक संघर्ष है... (खास-तौर पर तब, जब आपके पास बड़ा संदूक हो.. और ट्रेन के आने का समय निकट आ रहा हो...) जैसे-तैसे करके मैं स्टेशन पर पहुंचा और रुमाल के प्रयोग से बोगी में अपने लिए Window Seat "आरक्षित" करी.. और सामान व्यवस्थित करके दरवाजे के पास आ गया और अकारण ही ट्रेन के सिग्नल का इंतज़ार करने लगा.... तभी एक यात्री जो पेशे से कोई व्यापारी प्रतीत होता था.... अपने साथ एक विशालकाय बोरा (जिसमें सम्भवतया उसके वव्यापार का सामान रखा था) लेकर हमारी बोगी में प्रविष्ट हुआ और सामान के लिए जगह बनाने लगा.... मैं भी अपनी "आरक्षित" सीट का अस्तित्व खतरे में पाकर वापस अपने स्थान पर आ गया... और अपना हाथ रख कर ये दर्शा दिया कि ये सीट मैंने एक संघर्ष में जीती है और इसे अपना समझने की भूल कदापि ना करें....

तभी मेरा ध्यान मेरे बैग में रखे १ तोहफे की तरफ गया जो कि मेरे दोस्तों ने कॉलेज छोड़ते समय मुझे यादगार के तौर पर दिया था... मैं तुरंत ही अपने बैग की तरफ लपका और समय और स्थान की परवाह ना करते हुए आवेशवश वहीँ पर उसे खोलने में लग गया ... और देखते ही देखते बाकी यात्रियों का ध्यान भी उसी ओ़र चला गया... अपनी समस्याओं को भुलाकर सब यही जाने में इच्छुक थे कि इस रंग-बिरंगी अबरी के अंदर क्या तोहफा है... देखते ही देखते उस तोहफे के जरिये मैंने कम्पार्टमेंट में एक हेल-मेल स्थापित कर लिया था....

२० मिनट बीत गए और ना ही ट्रेन का कोई सिग्नल हुआ और ना ही हमे हुई "असुविधा" के लिए कोई खेद व्यक्त किया गया... मैंने भी अधीर होकर प्लेटफोर्म पर विचरण करने का मन बना लिया... लेकिन हर यात्री की तरह मेरे सामने भी एक बड़ी समस्या थी... "सामान" की निगरानी कौन करेगा... दूध का जला छाछ भी फूँक कर पीता है... मैं एक बार ये गलती कर चुका था और उसे दुबारा दोहराना नहीं चाहता था.... अब मेरा ध्येय एक इंसान/परिवार को ढूँढना था जो मेरी अनुपस्थिति में मेरे सामान की निगरानी कर सके.... तभी मेरा ध्यान एक आन्टी जी की तरफ गया जो अपनी बेटी को अंग्रेजी में बात करने की नसीहत दे रही थी... मुझे मेरे काम के लिए एक अच्छा उम्मीदवार मिल गया था.. आप सोच रहे होंगे कि अंग्रेजी के आवेश में आकर मैंने यह निर्णय लिया... परन्तु मैं ये बात यहाँ स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं स्वयं एक हिंदी-प्रेमी हूँ... वो महिला जिस कड़ाई, जिस नियमनिष्ठता से अपनी बेटी को अंग्रेजी सिखा रही थी.... उससे उनके सख्त व्यक्तित्व का पता चलता था....

मैं अपना सामान उस महिला की निगरानी में छोड़कर प्लेटफोर्म पर आ गया और अनायास ही विचरण करने लगा... कॉलेज का साथ छूटने की वजह से थोड़ा व्यथित था... जहाँ लोग व्यथा को दूर करने के लिए मदिरापान करते हैं... मैंने भी उस स्थान की उपलब्धता को जानते हुए IRCTC की चाय पीने का फैसला करा... वैसे वो बात अलग है कि सभी मदिराओं की तरह ये चाय भी फीकी और कड़वी थी... समय काटने के लिए मैं काउंटर पर बैठे आदमी से स्वेच्छित (arbitrary) विषयों पर बातें करने लगा... वो मुझे बताने लगा कि पुराने वाला ग्राहक अपना दस रूपए का नोट वापस लेना भूल गया था... और दुबारा वापस भी नहीं लेने आया.... तब हम लोग "दस रूपए" कि महत्ता पर शास्त्रार्थ करने लगे... हम दोनों का मानना था कि गरीब आदमी के सिवाय आज के समय में "दस रूपए" का कोई महत्व नहीं है... (हालांकि रिक्शे/ऑटो वाले को पैसे देते समय १ रुपया भी ज्यादा लगता है).. मैंने उन काउंटर वाले भैया को बाय कहा अपनी स्व-आरक्षित सीट की ओ़र लपका...

वैसे उस तोहफे की तरह उस व्यापारी का बोरा भी काफी दिलचस्प लग रहा था और मेरी समझ से सभी यात्री उसमे रखा सामान जानने में इच्छुक थे... तभी १ हवलदार "पैट्रोलिंग" करता हुआ हमारे कम्पार्टमेंट में आ पहुंचा ... और उसकी दृष्टि भी उस विशालकाय बोरी की ओ़र गयी... अपने ओहदे का लाभ उठाते हुए उसने बोरी में रखे सामान के बारे में जानने की इच्छा व्यक्त करी... ("इच्छा" से मेरा तात्पर्य "आदेश" से है.. वैसे भी बहुत ही कम लोग होते हैं जो अपनी इच्छा दूसरों पर थोप पाते हैं).. हम सब भी एकाएक अधीर हो गए... और बोरी क खुलने का इंतज़ार करने लगे.... अगले ही पल कुछ ऐसी घटना घटी जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया.... (नहीं-नहीं... उसमे कोई बम/बन्दूक नहीं थी...) वस्तुतः वो बोरी तो खोली ही नहीं गयी.... उस व्यापारी ने बिना कुछ कहे अपने व्यापारिक कौशल और निर्भयता का परिचय देते हुए बिना कुछ कहे अपना बटुआ निकला और एक "दस रूपए" का नोट निकालकर हवलदार को थमा दिया.... मुझे लगा अभी ये व्यापारी हवलदार के क्रोध का शिकार होगा... "दस रूपए" में हवलदार का ईमान खरीद रहा है... (कम से कम पचास रूपए तो बनते ही थे...) .. परन्तु वो हवलदार खुशी-खुशी वो नोट लेकर वहाँ से छू-मंतर हो गया... तभी ट्रेन के छूटने का संकेत हो गया ... मैं अपने पास वाली खिड़की से बहार उस काउंटर वाले भैया की तरफ देखने लगा.... ट्रेन भी अपनी निष्क्रियता त्याग कर गतिशील हो गयी थी.... और मैं मन ही मन ये सोच रहा था कि ... "दस रूपए का बहुत महत्व होता है"!!

Wednesday, October 13, 2010

Very thoughtful bhajan... :)

अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं
रामा नारायणं जानकी वल्लभं

कौन कहेते है भगवान आते नहीं
तुम मीरा के जैसे बुलाते नहीं

अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं
रामा नारायणं जानकी वल्लभं

कौन कहेते है भगवान खाते नहीं
बेर शबरी के जैसे खिलते नहीं

अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं
रामा नारायणं जानकी वल्लभं

कौन कहेते है भगवान सोते नहीं
माँ यशोदा के जैसे सुलाते नहीं

अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं
रामा नारायणं जानकी वल्लभं

कौन कहेते है भगवान नाचते नहीं
गोपियों के तरह तुम नचाते नहीं

अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरं
रामा नारायणं जानकी वल्लभं

Thursday, September 2, 2010

Need ur attention...

I will try to be as humble as I can in chosing my words, but if you get hurt morally or emotionally it can be assumed to be a very intentional attempt. Rather I would like you to get hurt.....

Recently the CWG 2010 has depicted the pictures of our hon'ble ministers. I still wonder how these politicians have changed the meaning of the word "honorable" over a short period of time. I don't know how many of you are aware of it, but as much as 84000 crores of Indian Rupees have been spent by the government where as the initial proposed budget was 3000 crores. People have reached such a level of corruption that the number is expected to reach around 120000 crores.

Just think of it for a moment... why a poor country like India needs to organize CWG... seems like our govt. is thinking to have a global status. What kind of policy is this?? Why do they want to serve other nations keeping the lives and future of our own citizens at stake? The Bhopal Gas Tragedy culprit exercises complete freedom by simply paying a very small amount.. whereas people are still seeking for justice.

Politicians like Mayawati are offered garlands made of 1000 rupee notes and no one (even our judiciary, which is supposed to be free from politics) ever questions where the money is coming from. The CBI has given clean chit to Mayawati in "आय से अधिक संपत्ति" issue. Even a layman can tell the truth. Coming back to CWG issue, in attempt to reflect the picture of RICH and PROSPEROUS INDIA, the govt. has ordered the schools to remain closed so that the slum people can be jailed in those schools and will therefore be not allowed to come out of those jails during the CWG. कोई देश कितना गिर सकता है...कोई भारत से पूछना..... !! x-( :(

Tuesday, May 18, 2010

Amazed by the behaviour of people here.....

Hello all,

As told in the previous blog that Canada is a multi-cultural nation..... its really surprising to find people so helpful and kind...

Being new in the city, we didn't have much idea how to get back to our college UBC while returning after having dinner at an Indian Restaurant....

We got down of the bus and started looking for someone who could tell us how to get back to UBC.... the driver noticed our behaviour.. stopped the bus and got down... (please note that the bus system here is pretty similar to the Metros at New Delhi.. their schedule is very rigid and fixed..)

still the driver got down and asked where we wanted to go... and on knowing the fact... he opened his mobile phone... being aware of the fact that we don't have one either... searched for the buses to UBC and also their timings... and also gave his phone no. so that we may call him in urgency...

i was completely taken back by his kind act...

and not only that.... almost all the people here can be found to be very helpful.... :)

Tuesday, May 11, 2010

At UBC,Vancouver :)

Hello all.... This is my first post about this beautiful place.. Its really great to have sunset at 2130 hrs... :)
We have been provided stay @ Marine Drive Residence... from where we get an amazing view of snow cladded Pacific Range....
Pacific Ocean is just few foot-steps away from our residence....

The campus is very beautiful... and one can easily spot Indians, Chinese, French but not Canadians.... :P

This is the peculiarity of Canada... you can find people from different cultures and nations more easily than the native Canadians... :)

I would be willing to write few such blogs about UBC alone.. because its beauty can not be described in a single post.
:)

Wednesday, April 28, 2010

My first Blog

Yeah... inspired by Bhaskar's Blogs..... I have also made up my mind towards blogging...
Being the very first blog of mine... I am not sure where to start with... but I think I would soon be knowing it with time....