दस रूपए!!
वैसे तो कानपुर से लखनऊ की दूरी मात्र ८० किलोमीटर ही है.... लेकिन ये २ घंटे की रेल यात्रा सदा रोमांचकारी रही है.... दीक्षांत समारोह समाप्त हो चुका था... और मैं फिर भी कॉलेज छोड़के नहीं जाना चाहता था... चार साल जिस पल का इंतज़ार सबको रहता है.... चार साल बाद वही पल भारी प्रतीत होता है... २९ मई, २०११ .. सभी दोस्त एक-दूसरे को विदाई दे रहे थे और भविष्य में मिलते रहने की नसीहत .... भारी मन से मैंने भी दोस्तों को अलविदा कहा.. और फिर ऑटो में बैठ गया और रेलवे स्टेशन को चल दिया....
वैसे कानपुर-लखनऊ जैसे शहरों में रेलवे टिकेट खरीदना भी एक संघर्ष है... (खास-तौर पर तब, जब आपके पास बड़ा संदूक हो.. और ट्रेन के आने का समय निकट आ रहा हो...) जैसे-तैसे करके मैं स्टेशन पर पहुंचा और रुमाल के प्रयोग से बोगी में अपने लिए Window Seat "आरक्षित" करी.. और सामान व्यवस्थित करके दरवाजे के पास आ गया और अकारण ही ट्रेन के सिग्नल का इंतज़ार करने लगा.... तभी एक यात्री जो पेशे से कोई व्यापारी प्रतीत होता था.... अपने साथ एक विशालकाय बोरा (जिसमें सम्भवतया उसके वव्यापार का सामान रखा था) लेकर हमारी बोगी में प्रविष्ट हुआ और सामान के लिए जगह बनाने लगा.... मैं भी अपनी "आरक्षित" सीट का अस्तित्व खतरे में पाकर वापस अपने स्थान पर आ गया... और अपना हाथ रख कर ये दर्शा दिया कि ये सीट मैंने एक संघर्ष में जीती है और इसे अपना समझने की भूल कदापि ना करें....
तभी मेरा ध्यान मेरे बैग में रखे १ तोहफे की तरफ गया जो कि मेरे दोस्तों ने कॉलेज छोड़ते समय मुझे यादगार के तौर पर दिया था... मैं तुरंत ही अपने बैग की तरफ लपका और समय और स्थान की परवाह ना करते हुए आवेशवश वहीँ पर उसे खोलने में लग गया ... और देखते ही देखते बाकी यात्रियों का ध्यान भी उसी ओ़र चला गया... अपनी समस्याओं को भुलाकर सब यही जाने में इच्छुक थे कि इस रंग-बिरंगी अबरी के अंदर क्या तोहफा है... देखते ही देखते उस तोहफे के जरिये मैंने कम्पार्टमेंट में एक हेल-मेल स्थापित कर लिया था....
२० मिनट बीत गए और ना ही ट्रेन का कोई सिग्नल हुआ और ना ही हमे हुई "असुविधा" के लिए कोई खेद व्यक्त किया गया... मैंने भी अधीर होकर प्लेटफोर्म पर विचरण करने का मन बना लिया... लेकिन हर यात्री की तरह मेरे सामने भी एक बड़ी समस्या थी... "सामान" की निगरानी कौन करेगा... दूध का जला छाछ भी फूँक कर पीता है... मैं एक बार ये गलती कर चुका था और उसे दुबारा दोहराना नहीं चाहता था.... अब मेरा ध्येय एक इंसान/परिवार को ढूँढना था जो मेरी अनुपस्थिति में मेरे सामान की निगरानी कर सके.... तभी मेरा ध्यान एक आन्टी जी की तरफ गया जो अपनी बेटी को अंग्रेजी में बात करने की नसीहत दे रही थी... मुझे मेरे काम के लिए एक अच्छा उम्मीदवार मिल गया था.. आप सोच रहे होंगे कि अंग्रेजी के आवेश में आकर मैंने यह निर्णय लिया... परन्तु मैं ये बात यहाँ स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं स्वयं एक हिंदी-प्रेमी हूँ... वो महिला जिस कड़ाई, जिस नियमनिष्ठता से अपनी बेटी को अंग्रेजी सिखा रही थी.... उससे उनके सख्त व्यक्तित्व का पता चलता था....
मैं अपना सामान उस महिला की निगरानी में छोड़कर प्लेटफोर्म पर आ गया और अनायास ही विचरण करने लगा... कॉलेज का साथ छूटने की वजह से थोड़ा व्यथित था... जहाँ लोग व्यथा को दूर करने के लिए मदिरापान करते हैं... मैंने भी उस स्थान की उपलब्धता को जानते हुए IRCTC की चाय पीने का फैसला करा... वैसे वो बात अलग है कि सभी मदिराओं की तरह ये चाय भी फीकी और कड़वी थी... समय काटने के लिए मैं काउंटर पर बैठे आदमी से स्वेच्छित (arbitrary) विषयों पर बातें करने लगा... वो मुझे बताने लगा कि पुराने वाला ग्राहक अपना दस रूपए का नोट वापस लेना भूल गया था... और दुबारा वापस भी नहीं लेने आया.... तब हम लोग "दस रूपए" कि महत्ता पर शास्त्रार्थ करने लगे... हम दोनों का मानना था कि गरीब आदमी के सिवाय आज के समय में "दस रूपए" का कोई महत्व नहीं है... (हालांकि रिक्शे/ऑटो वाले को पैसे देते समय १ रुपया भी ज्यादा लगता है).. मैंने उन काउंटर वाले भैया को बाय कहा अपनी स्व-आरक्षित सीट की ओ़र लपका...
वैसे उस तोहफे की तरह उस व्यापारी का बोरा भी काफी दिलचस्प लग रहा था और मेरी समझ से सभी यात्री उसमे रखा सामान जानने में इच्छुक थे... तभी १ हवलदार "पैट्रोलिंग" करता हुआ हमारे कम्पार्टमेंट में आ पहुंचा ... और उसकी दृष्टि भी उस विशालकाय बोरी की ओ़र गयी... अपने ओहदे का लाभ उठाते हुए उसने बोरी में रखे सामान के बारे में जानने की इच्छा व्यक्त करी... ("इच्छा" से मेरा तात्पर्य "आदेश" से है.. वैसे भी बहुत ही कम लोग होते हैं जो अपनी इच्छा दूसरों पर थोप पाते हैं).. हम सब भी एकाएक अधीर हो गए... और बोरी क खुलने का इंतज़ार करने लगे.... अगले ही पल कुछ ऐसी घटना घटी जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया.... (नहीं-नहीं... उसमे कोई बम/बन्दूक नहीं थी...) वस्तुतः वो बोरी तो खोली ही नहीं गयी.... उस व्यापारी ने बिना कुछ कहे अपने व्यापारिक कौशल और निर्भयता का परिचय देते हुए बिना कुछ कहे अपना बटुआ निकला और एक "दस रूपए" का नोट निकालकर हवलदार को थमा दिया.... मुझे लगा अभी ये व्यापारी हवलदार के क्रोध का शिकार होगा... "दस रूपए" में हवलदार का ईमान खरीद रहा है... (कम से कम पचास रूपए तो बनते ही थे...) .. परन्तु वो हवलदार खुशी-खुशी वो नोट लेकर वहाँ से छू-मंतर हो गया... तभी ट्रेन के छूटने का संकेत हो गया ... मैं अपने पास वाली खिड़की से बहार उस काउंटर वाले भैया की तरफ देखने लगा.... ट्रेन भी अपनी निष्क्रियता त्याग कर गतिशील हो गयी थी.... और मैं मन ही मन ये सोच रहा था कि ... "दस रूपए का बहुत महत्व होता है"!!

